पश्चिम बंगाल में नवगठित भारतीय जनता पार्टी सरकार द्वारा अवैध बांग्लादेशी प्रवासियों के खिलाफ शुरू किए गए व्यापक निष्कासन अभियान ने केंद्र सरकार की ‘थ्री-डी’ यानी डिटेक्ट, डिलीट एंड डिपोर्ट नीति को मुख्यधारा के विमर्श में ला दिया है。 १ जून २०२६ को जारी इस विशेष रणनीतिक रिपोर्ट के अनुसार, नए आव्रजन और विदेशी अधिनियम २०२५ के तहत राज्य सरकार ने संदिग्ध घुसपैठियों की पहचान करने और उन्हें सीधे सीमा सुरक्षा बल को सौंपने की प्रक्रिया को युद्धस्तर पर तेज कर दिया है। इस कड़े प्रशासनिक रुख के कारण उत्तर २४ परगना के हकीमपुर सीमा चौकी जैसे क्षेत्रों में अवैध रूप से रह रहे प्रवासियों की भारी भीड़ देखी जा रही है, जो हिरासत केंद्रों की कैद से बचने के लिए खुद ही वापस बांग्लादेश लौटने की कोशिश कर रहे हैं। राज्य सरकार ने इन लोगों की पहचान सत्यापित करने के लिए सीमावर्ती क्षेत्रों में कई अस्थाई होल्डिंग सेंटर भी स्थापित किए हैं। हालांकि, मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी ने आश्वस्त किया है कि ३१ दिसंबर २०२४ से पहले भारत में प्रवेश करने वाले और नागरिकता संशोधन अधिनियम के तहत पात्र शरणार्थियों को इस अभियान से कोई परेशानी नहीं होगी।
इस तीव्र नीतिगत कार्रवाई ने जहां एक तरफ आंतरिक सुरक्षा और जनसांख्यिकीय संतुलन को मजबूत किया है, वहीं दूसरी तरफ न्यायिक प्रक्रियाओं और द्विपक्षीय राजनयिक संबंधों को लेकर नए सवाल भी खड़े कर दिए हैं। मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और कानूनी विशेषज्ञों ने चिंता व्यक्त की है कि एफआईआर दर्ज किए बिना और न्यायाधिकरणों या अदालतों के दीर्घकालिक कानूनी हस्तक्षेप के बिना किए जा रहे ये त्वरित ‘पुशबैक’ मानवाधिकारों और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विपरीत हैं, जिससे वास्तविक भारतीय नागरिकों के भी प्रताड़ित होने का खतरा बढ़ जाता है। इसके अतिरिक्त, पड़ोसी देश बांग्लादेश की सरकार ने इस एकतरफा और जबरन निष्कासन प्रक्रिया पर अपनी सख्त संप्रभुता संबंधी आपत्ति दर्ज कराई है। ढाका के विदेश मंत्रालय का स्पष्ट कहना है कि किसी भी प्रकार की वापसी केवल सत्यापित राष्ट्रीय पहचान प्रक्रियाओं और औपचारिक राजनयिक चैनलों के माध्यम से ही होनी चाहिए। इस तनाव को देखते हुए बॉर्डर गार्ड बांग्लादेश ने अपनी सीमाओं पर गश्त को अत्यधिक कड़ा कर दिया है, जिससे यह साफ है कि क्षेत्रीय चुनावी प्राथमिकताओं और अंतरराष्ट्रीय द्विपक्षीय संबंधों के बीच एक नाजुक संतुलन बनाए रखना नई दिल्ली और कोलकाता दोनों के लिए एक बड़ी कूटनीतिक चुनौती होगी।
