स्वस्थ रहने के लिए सिर्फ पौष्टिक और ताजा भोजन खाना ही काफी नहीं है, बल्कि यह भी जरूरी है कि खाना किस बर्तन में पकाया और रखा जा रहा है। आजकल किचन में प्लास्टिक के डिब्बे, चम्मच और अन्य बर्तनों का इस्तेमाल आम हो गया है, लेकिन यही आदत शरीर में माइक्रोप्लास्टिक पहुंचाने का कारण बन सकती है।
विशेषज्ञों के अनुसार, प्लास्टिक के बर्तनों में रखे या तैयार किए गए भोजन में बेहद छोटे प्लास्टिक कण मिल सकते हैं। ये माइक्रोप्लास्टिक आंखों से दिखाई नहीं देते, लेकिन भोजन के जरिए शरीर में पहुंचकर रक्त के माध्यम से विभिन्न अंगों तक पहुंच सकते हैं। इससे बचाव के लिए खाना पकाने और स्टोर करने में कांच, लकड़ी, स्टेनलेस स्टील या कास्ट आयरन जैसे सुरक्षित विकल्प अपनाने की सलाह दी जाती है।
बाजार में मिलने वाली कैनबंद बीन्स और दालें सुविधाजनक जरूर होती हैं, लेकिन इनके अंदर जंग से बचाव के लिए प्लास्टिक की कोटिंग की जाती है। समय के साथ इस परत के कुछ रसायन खाद्य पदार्थों में मिल सकते हैं। ऐसे में बेहतर विकल्प यह है कि सूखी दालें, राजमा और चने खरीदकर उन्हें रातभर भिगोने के बाद इस्तेमाल किया जाए।
गर्म भोजन को प्लास्टिक के डिब्बों में रखना, प्लास्टिक की चम्मच से उबलते भोजन को चलाना या प्लास्टिक के चॉपिंग बोर्ड पर सब्जियां काटना भी माइक्रोप्लास्टिक के संपर्क को बढ़ा सकता है। इसके बजाय स्टेनलेस स्टील, कास्ट आयरन या पीतल के बर्तनों का उपयोग करें और प्लास्टिक की जगह लकड़ी के चॉपिंग बोर्ड को प्राथमिकता दें।
कई घरों में इस्तेमाल होने वाले प्लास्टिक ब्लेंडर भी माइक्रोप्लास्टिक का स्रोत बन सकते हैं। ब्लेंडिंग के दौरान तेज गति से होने वाले घर्षण के कारण प्लास्टिक की सतह से बेहद छोटे कण भोजन में मिल सकते हैं। यदि संभव हो तो स्टेनलेस स्टील वाले ब्लेंडर जार या कप का इस्तेमाल करना अधिक सुरक्षित माना जाता है।
खाना स्टोर करने के लिए भी प्लास्टिक के कंटेनर की बजाय कांच के बर्तनों का उपयोग बेहतर विकल्प है। यह केवल गर्म भोजन ही नहीं, बल्कि सामान्य तापमान पर रखे खाद्य पदार्थों में भी माइक्रोप्लास्टिक के संभावित संपर्क को कम करने में मदद कर सकता है। किचन में ऐसे छोटे-छोटे बदलाव अपनाकर आप अपने और परिवार के स्वास्थ्य की बेहतर सुरक्षा कर सकते हैं।
