पश्चिम बंगाल में भारतीय जनता पार्टी की नई सरकार के सत्ता में आने के बाद कथित तौर पर अवैध रूप से रह रहे मुस्लिम बांग्लादेशी प्रवासियों के खिलाफ एक बड़ा राष्ट्रव्यापी नागरिकता और निष्कासन अभियान शुरू किया गया है। राज्य के नवनिर्वाचित मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी ने ‘डिटेक्ट, डिलीट और डिपोर्ट’ नीति के तहत अवांछित प्रवासियों की पहचान करने, उन्हें हिरासत केंद्रों में रखने और अंततः सीमा पार वापस भेजने के कड़े आदेश दिए हैं। इस व्यापक धरपकड़ के तहत पिछले दो हफ्तों में राज्य भर से हजारों संदिग्ध लोगों को हिरासत में लिया गया है। मुख्यमंत्री के अनुसार, अब तक लगभग चार हजार आठ सौ बांग्लादेशी नागरिकों को नव-स्थापित होल्डिंग सेंटरों के माध्यम से वापस भेजा जा चुका है और लगभग आठ सौ छतीस अन्य लोग अभी भी विभिन्न जिलों के केंद्रों में अपनी नागरिकता सत्यापन और निर्वासन की बारी का इंतजार कर रहे हैं।
इस कार्रवाई ने न केवल प्रवासियों, बल्कि राज्य के स्थानीय बंगाली भाषी भारतीय मुसलमानों के भीतर भी एक गहरा डर और असुरक्षा की भावना पैदा कर दी है, क्योंकि उन्हें आशंका है कि इस अभियान में उनकी धार्मिक पहचान को लेकर उन्हें भी निशाना बनाया जा सकता है। सरकार की नीति के तहत नागरिकता संशोधन कानून के कड़े प्रावधानों के कारण केवल मुस्लिम प्रवासियों को ही बेदखल किया जा रहा है, जबकि गैर-मुस्लिम शरणार्थियों को इस प्रक्रिया से पूरी तरह छूट दी गई है। नागरिक अधिकार कार्यकर्ताओं और मानवाधिकार संगठनों ने इस पूरी कवायद में पारदर्शिता की कमी और कानूनी प्रक्रियाओं की अनदेखी पर गंभीर चिंता व्यक्त की है। इस बीच, सीमा पर दोनों देशों के सुरक्षा बलों के बीच भी तनाव देखा गया है, जहां बॉर्डर गार्ड बांग्लादेश ने कथित तौर पर भारतीय सुरक्षा बलों द्वारा प्रवासियों को जबरन सीमा पार धकेलने के कम से कम अठारह प्रयासों को विफल करने का दावा किया है। यह संवेदनशील राजनीतिक और सामाजिक मुद्दा राज्य की लगभग सत्ताइस प्रतिशत मुस्लिम आबादी के बीच आपसी सौहार्द के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है।
