महज पांच साल की उम्र में झंडू कुमार पोलियो की चपेट में आ गए थे। इसके बाद उनकी जिंदगी संघर्षों से भर गई। अपने पैरों पर खड़े न हो पाने का दर्द उन्हें हमेशा महसूस होता था, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। हालात चाहे जैसे रहे हों, उन्होंने अपने सपनों का पीछा नहीं छोड़ा और आखिरकार अपनी मंजिल हासिल कर ली।
आज बिहार के झंडू कुमार किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। संघर्ष से सफलता तक का उनका सफर लाखों लोगों के लिए प्रेरणा बन चुका है। पैरा पावरलिफ्टिंग में देश को पहला कॉमनवेल्थ गेम्स पदक दिलाने वाले झंडू की सफलता के पीछे वर्षों की मेहनत और कठिन संघर्ष छिपा है। कोरोना महामारी के दौरान परिवार का गुजारा करने के लिए उन्होंने कभी सब्जियां बेचीं तो कभी ई-रिक्शा चलाया, लेकिन आर्थिक तंगी को उन्होंने अपने सपनों के बीच कभी नहीं आने दिया।
कॉमनवेल्थ गेम्स में रचा इतिहास
झंडू कुमार ने कॉमनवेल्थ गेम्स में पैरा पावरलिफ्टिंग के हेवीवेट 130.9 किलोग्राम वर्ग में ब्रॉन्ज मेडल जीतकर इतिहास रच दिया। यह उनके करियर का पहला अंतरराष्ट्रीय पदक था। इस उपलब्धि के साथ उन्होंने न सिर्फ बिहार बल्कि पूरे देश का नाम रोशन किया। पदक जीतने के बाद झंडू भावुक हो गए और उनकी आंखों में खुशी के आंसू साफ दिखाई दिए।
पिता बेचते हैं सब्जी, बेटे ने बढ़ाया देश का मान
झंडू कुमार के माता-पिता बिहार के नालंदा में सब्जी बेचकर परिवार का पालन-पोषण करते हैं। कोरोना महामारी के दौरान झंडू ने भी परिवार का हाथ बंटाने के लिए सड़क किनारे सब्जियां बेचीं। इतना ही नहीं, घर का खर्च चलाने के लिए उन्होंने ई-रिक्शा भी चलाया। आर्थिक परेशानियों के बावजूद उन्होंने अपने खेल से समझौता नहीं किया और लगातार मेहनत करते रहे। आज वही झंडू लाखों युवाओं के लिए प्रेरणा बन चुके हैं।
“ऐसा लग रहा है जैसे हवा में उड़ रहा हूं”
ब्रॉन्ज मेडल जीतने के बाद झंडू कुमार ने अपनी खुशी जाहिर करते हुए कहा कि उन्हें ऐसा महसूस हो रहा है जैसे वे हवा में उड़ रहे हों। उन्होंने कहा कि उनका एकमात्र लक्ष्य देश के लिए पदक जीतना था और उसे हासिल कर उन्होंने अपना सपना पूरा कर लिया।
