‘भाई छातु’ बंगाल की एक बेहद दुर्लभ और धीरे-धीरे लुप्त हो रही पारंपरिक रस्म है, जिसे आज भी कुछ ‘बांगाल’ परिवारों द्वारा चैत्र संक्रांति के अवसर पर बेहद श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। भाई दूज की ही तरह यह त्योहार भी भाई-बहन के पवित्र रिश्ते और भाई की लंबी उम्र की कामना को समर्पित है। इस दिन बहनें सुबह जल्दी उठकर उपवास रखती हैं और अपने भाई के माथे पर चन्दन, दही और धान-दूर्वा (घास) से तिलक लगाकर उनके सुखी और दीर्घायु जीवन की प्रार्थना करती हैं।
इस अनूठी रस्म की सबसे बड़ी खासियत इसके नाम में छिपा ‘छातु’ (सत्तू) है। पूजा और तिलक की रस्म पूरी होने के बाद, भाइयों को सात अलग-अलग प्रकार के अनाजों को भूनकर और पीसकर तैयार किया गया विशेष सत्तू खिलाया जाता है, जिसे गुड़ या केले के साथ परोसा जाता है। आधुनिकता की दौड़ और व्यस्त जीवनशैली के कारण जहाँ यह पारंपरिक रीति-रिवाज अब बंगाल के अधिकांश घरों से गायब होने लगा है, वहीं कुछ पुराने बांगाल परिवार अपनी सांस्कृतिक जड़ों और धरोहर को जीवित रखने के लिए इस रस्म को हर साल पूरी निष्ठा के साथ निभाते आ रहे हैं।
