बंगाल का पुराना सांप्रदायिक इतिहास भाजपा के ध्रुवीकरण एजेंडे के लिए उपजाऊ जमीन स्क्रॉल की रिपोर्ट

पश्चिम बंगाल की धर्मनिरपेक्ष राजनीति की सार्वजनिक धारणा के विपरीत, राज्य का औपनिवेशिक और विभाजन-पूर्व का इतिहास वास्तव में सांप्रदायिक राजनीति से अछूता नहीं रहा है. लेख के अनुसार, वर्ष 1930 और 1940 के दशकों के दौरान हिंदू राष्ट्रवादी विचारों ने बंगाल के भद्रलोक उच्च-मध्यम वर्ग के राजनीतिक विमर्श को गहराई से आकार दिया था. इस दौर में राजनीतिक दलों ने चुनावों में खुलकर धर्म आधारित और विभाजन से जुड़े मुद्दों को अपनी रणनीति का हिस्सा बनाया था. बीती सदी की यही सांप्रदायिक पृष्ठभूमि वर्तमान समय में भारतीय जनता पार्टी भाजपा के ध्रुवीकरण और हिंदू पहचान से जुड़े एजेंडे के लिए एक बेहद उपजाऊ जमीन फर्टाइल ग्राउंड का काम कर रही है.

लेख में ऐतिहासिक संदर्भों का हवाला देते हुए बताया गया है कि 20वीं सदी की शुरुआत में बंगाली मुस्लिमों के बीच बढ़ती धार्मिक चेतना के जवाब में ही बंगाली हिंदुओं की पहचान और लामबंदी मजबूत होने लगी थी. इसके बाद 1932 के कम्यूनल अवार्ड सांप्रदायिक पंचाट ने बंगाल विधायिका में धार्मिक आधार पर सीटों के समीकरण को पूरी तरह बदल दिया, जिससे भद्रलोक समाज में अपने आर्थिक और सांस्कृतिक विशेषाधिकारों को खोने का डर पैदा हो गया. इसी असंतोष का फायदा उठाकर 1939 में पुनर्जीवित हुई हिंदू महासभा और बंगाल प्रदेश कांग्रेस कमेटी ने हिंदू हितों के लिए मुखर होकर काम करना शुरू किया. 1946-47 के कलकत्ता और नोआखली के भीषण सांप्रदायिक दंगों के बाद, विस्थापित होने के डर से ही बंगाली हिंदुओं ने कलकत्ता को राजधानी बनाकर एक हिंदू-बाहुल्य पश्चिम बंगाल राज्य के निर्माण के लिए लोकप्रिय आंदोलन चलाया था. विश्लेषण के अनुसार, इतिहास की यही अनसुलझी कड़वाहट, शरणार्थी संकट और जनसांख्यिकीय बदलाव की चिंताएं आज भी समाज के अचेतन मन में मौजूद हैं, जिसे पुनर्जीवित करके भाजपा राज्य में एक स्थायी और मजबूत हिंदू वोटबैंक का निर्माण करने की रणनीति पर काम कर रही है.

By rohan