आज मकर संक्रांति (पौष संक्रांति) के शुभ अवसर पर जलপাইगुड़ी जिले के घर-घर में पारंपरिक ‘वास्तु पूजा’ का उल्लास देखा जा रहा है। कड़ाके की ठंड और सुबह 3 बजे से ही घने कोहरे की चादर में लिपटे शहर में शंखध्वनि और ‘उलु ध्वनि’ (Ulu-dhwani) ने उत्सव का आगाज किया।मकर संक्रांति के इस विशेष पर्व पर जलপাইगुड़ी के पातकाटा कॉलोनी सहित विभिन्न क्षेत्रों की महिलाओं ने सुबह के शुरुआती घंटों में ही स्नान आदि कर पूजा की रस्में शुरू कर दीं।
पुरोहितों के सानिध्य में विधि-विधान के साथ वास्तु पूजा संपन्न की जा रही है, जिसमें घर के छोटे-बड़े सभी सदस्य शामिल हो रहे हैं।घरों के आंगन, तुलसी मंच, मुख्य द्वार और ठाकुर घर (मंदिर) को चावल के आटे (पीठा-गुड़ो) के घोल से बने सुंदर छापों से सजाया गया है। इन पर सिंदूर लगाकर संतरे, तिल के लड्डू, कदमा, बताशा और फूलों से अर्घ्य अर्पित किया गया।यह पर्व मुख्य रूप से ग्रामीण बंगाल की कृषि संस्कृति का प्रतीक है: किसान इस समय नया धान घर लाते हैं और उसी नए चावल के आटे से पीठा-पुलि और पायस (खीर) जैसे लजीज व्यंजन तैयार किए जाते हैं।
मान्यता है कि संक्रांति के दिन वास्तु देवता की पूजा करने से परिवार और घर में सुख, शांति और समृद्धि का वास होता है।हाड़ कपा देने वाली शीत लहर और दृश्यता कम होने के बावजूद, परंपरा का उत्साह कम नहीं हुआ। पूर्वजों द्वारा शुरू की गई इस विरासत को आज की पीढ़ी भी उतनी ही निष्ठा के साथ निभा रही है। संक्रांति की इस सुबह पूरा जलपाईगुड़ी भक्ति और उत्सव के माहौल में सराबोर है।
