बंगाल में गंगा संरक्षण को गति: नमामि गंगे की दो सीवरेज परियोजनाओं से बदलेगी तस्वीर

गंगा के पुनर्जीवन और शहरी स्वच्छता को मजबूत करने की दिशा में पश्चिम बंगाल ने एक अहम कदम बढ़ाया है। वित्त वर्ष 2025–26 में नमामि गंगे मिशन चरण–II के तहत राज्य में दो प्रमुख सीवेज ट्रीटमेंट परियोजनाएँ पूरी होकर संचालन में आ चुकी हैं। इन परियोजनाओं से गंगा में गिरने वाले बिना उपचारित अपशिष्ट जल पर प्रभावी अंकुश लगेगा और शहरी इलाकों की स्वच्छता व्यवस्था को नई मजबूती मिलेगी। दक्षिण 24 परगना जिले के महेशतला क्षेत्र में शुरू हुई पहली परियोजना गंगा संरक्षण की दिशा में एक बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है। हाइब्रिड एन्युटी मॉडल पर आधारित “इंटरसेप्शन, डायवर्ज़न एंड ट्रीटमेंट वर्क्स” परियोजना को लगभग ₹286.97 करोड़ की लागत से विकसित किया गया है। इसके तहत 35 एमएलडी क्षमता का अत्याधुनिक सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट स्थापित किया गया है, जिससे महेशतला और आसपास के घनी आबादी वाले इलाकों के सीवेज का वैज्ञानिक और सुरक्षित उपचार संभव हो सकेगा।

दूसरी परियोजना मुर्शिदाबाद जिले के जंगीपुर और रघुनाथगंज क्षेत्रों में आकार ले चुकी है। लगभग ₹68.47 करोड़ की लागत से तैयार इस योजना के अंतर्गत 13 एमएलडी की संयुक्त क्षमता वाले दो सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट लगाए गए हैं। साथ ही 11.38 किलोमीटर लंबा विस्तृत सीवरेज नेटवर्क भी विकसित किया गया है, जिससे घरों और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों से निकलने वाला अपशिष्ट जल सीधे उपचार संयंत्रों तक पहुँचेगा।

दोनों परियोजनाओं में सीवेज उपचार के लिए आधुनिक सीक्वेंशियल बैच रिएक्टर (SBR) तकनीक अपनाई गई है, जो राष्ट्रीय हरित अधिकरण द्वारा निर्धारित सख्त पर्यावरणीय मानकों के अनुरूप है। जहाँ महेशतला परियोजना को हाइब्रिड एन्युटी मॉडल पर लागू किया गया है, वहीं मुर्शिदाबाद की परियोजना डिज़ाइन–बिल्ड–ऑपरेट–ट्रांसफर (DBOT) मॉडल के तहत क्रियान्वित की गई है। इन प्रयासों का मूल उद्देश्य शहरी क्षेत्रों में सीवेज के प्रभावी इंटरसेप्शन और डायवर्ज़न को सुनिश्चित करना है, ताकि गंगा नदी में बिना उपचारित अपशिष्ट जल का प्रवेश रोका जा सके। इससे न केवल नदी की जल गुणवत्ता में सुधार होगा, बल्कि जनस्वास्थ्य, पर्यावरण संरक्षण और जीवन स्तर पर भी सकारात्मक असर पड़ेगा।

By Business Bureau