नई दिल्ली मणिपुर की मौजूदा स्थिति को एक ‘होरिजेंटल’ यानी समुदायों के बीच के संघर्ष के रूप में देख रही है, जबकि राज्य के भीतर उठ रही अलग प्रशासन की मांग और उग्रवाद इसे एक जटिल ‘वर्टिकल’ समस्या बनाते हैं। केंद्र का प्राथमिक ध्यान हिंसा को रोकने और विभिन्न जातीय समूहों के बीच बातचीत के जरिए शांति बहाल करने पर केंद्रित है, लेकिन सुरक्षा बलों के लिए पहाड़ी और घाटी क्षेत्रों के बीच की गहरी खाई को पाटना एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। लेख यह रेखांकित करता है कि जब तक राजनीतिक समाधान के साथ-साथ जमीनी स्तर पर विश्वास बहाली के प्रयास नहीं किए जाते, तब तक केवल सुरक्षा के नजरिए से स्थिति को संभालना मुश्किल होगा।
लेख में इस बात पर भी जोर दिया गया है कि मणिपुर में सामान्य स्थिति बहाल करने के लिए केंद्र को अपनी रणनीति में बदलाव करने की जरूरत है। वर्तमान में लागू किए गए सुरक्षा उपाय और बफर जोन केवल तात्कालिक राहत दे रहे हैं, जबकि उग्रवादी समूहों की सक्रियता और हथियारों की अवैध आपूर्ति भविष्य के लिए बड़ा खतरा पैदा कर रही है। भारत सरकार को राज्य की क्षेत्रीय अखंडता को बनाए रखते हुए सभी समुदायों की शिकायतों का समाधान करना होगा, ताकि इस सीमावर्ती राज्य में दीर्घकालिक शांति और स्थिरता सुनिश्चित की जा सके।
