बंगाल के पारंपरिक त्योहार ‘पौष संक्रांति’ (मकर संक्रांति ) में अब कुछ ही दिन शेष हैं। इस अवसर पर बनने वाले प्रसिद्ध ‘पीठे-पुली’ (पारंपरिक मिठाइयां) के लिए सबसे महत्वपूर्ण बर्तन ‘मिट्टी के सरा’ की बिक्री अब जोर पकड़ने लगी है। आधुनिकता के दौर में भी बंगाल की इस विरासत को ग्रामीण क्षेत्रों ने जीवित रखा है।गांवों की गलियों में सजीं गाड़ियांग्रामीण बंगाल के रास्तों पर इन दिनों मिट्टी के छोटे-बड़े ‘सरा’ (मिट्टी की छिछली थाली या ढक्कन) से लदी वैन गाड़ियां और ठेले आम देखे जा रहे हैं। पीठे बनाने के लिए मिट्टी के इन बर्तनों का विशेष महत्व होता है।
विक्रेता गांव-गांव घूमकर अलग-अलग आकारों के सरा बेच रहे हैं।परंपरा बचाने की कोशिशमिट्टी के सरा खरीद रहे स्थानीय निवासियों का कहना है कि हालांकि आजकल पीठे बनाने के लिए आधुनिक बर्तनों का उपयोग बढ़ गया है, लेकिन जो स्वाद और सुगंध मिट्टी के सरा में बने पीठे में आती है, वह कहीं और नहीं मिलती। एक खरीदार ने कहा, “प्रचलन कम जरूर हुआ है, लेकिन हम आज भी परंपरा को निभाते हुए मिट्टी के बर्तन ही खरीदते हैं।”बाजार अब गांवों तक सिमटामिट्टी के बर्तन बेचने वाले विक्रेताओं का कहना है कि अब शहरों में इसकी मांग न के बराबर रह गई है। एक विक्रेता ने बताया, “पहले की तुलना में बिक्री काफी कम हो गई है।
अब हमारी उम्मीदें सिर्फ ग्राम-बंगाल पर टिकी हैं। हम दिन भर वैन लेकर गांवों में घूमते हैं ताकि साल के इस समय कुछ कमाई हो सके।”सांस्कृतिक महत्वपौष पार्बण बंगाल का एक ऐसा उत्सव है जो सीधे तौर पर मिट्टी और कृषि से जुड़ा है। मिट्टी के सरा न केवल पीठे बनाने के काम आते हैं, बल्कि इन्हें शुभ भी माना जाता है। बदलते समय के साथ इन मिट्टी के बर्तनों का बाजार भले ही छोटा हो गया हो, लेकिन ग्रामीण अंचल की रसोई में इनका महत्व आज भी बरकरार है।
