भारत टैक्सी और जीएसटी का सवालः ड्राइवरों को सशक्त बनाने के लिए पॉलिसी में स्पष्टता है ज़रूरी

ड्राइवरों के स्वामित्व का और सब्सक्रिप्शन आधारित राईड प्लेटफॉर्म भारत टैक्सी देश के उभरती गिग इकोनॉमी में एक महत्वपूर्ण मोड़ है। आम एग्रीगेटर्स के लिए कोऑपरेटिव एवं कम कमिशन वाले विकल्प के रूप में डिज़ाइन किया गया यह प्लेटफॉर्म ऑटो एवं कैब ड्राइवरों को अपनी कमाई पर नियन्त्रण और गरिमा प्रदान करता है, जो भारत के शहरी एवं अर्द्ध शहरी परिवहन नेटवर्क की रीढ़ हैं।   हालांकि इस मॉडल के विस्तृत होने के साथ एक बुनियादी सवाल उठा रहा हैः क्या भारत का टैक्स फ्रेमवर्क ऐसे इनोवेशन्स को सपोर्ट करता है जो ड्राइवरों को सशक्त बनाते हैं, या अनजाने में उन्हें कमज़ोर बना सकते हैं? इस मुद्दे की जड़ में सब्सक्रिप्शन-आधारित या एसएएएस राइड-हेलिंग मॉडल के तहत राइड के किराए पर प्रस्तावित 5 फीसदी जीएसटी है। कमीशन वाले प्लेटफॉर्म के विपरीत, जहां हर ट्रिप पर कुछ परसेंट शुल्क काटा जाता है, ये मॉडल अलग तरह से काम करते हैं। ड्राइवर को टेक्नोलॉजी के एक्सेस के लिए एक निर्धारित मेंबरशिप फीस देनी होती है, जिससे उन्हें राइडरों के साथ कनेक्ट होने में मदद मिलती है। इस प्लेटफॉर्म पर किराया सीधे ड्राइवरों और राइडरों के बीच ऑफलाईन तय किए जाते हैं। प्लेटफॉर्म न तो कीमत पर नियन्त्रण रखता है, औन न ही पेमेंट को हैंडल करता है।

यह अंतर बहुत ज़रूरी है। जीएसटी के लिए एसएएएस प्लेटफॉर्म को पारंपरिक ई-कॉमर्स एग्रीगेटर के समकक्ष रखने से कानूनी और फंक्शनल वास्तविकता धुंधली होने लगती है। जीएसटी अधिनियम की धारा 9(5) ई-कॉमर्स ऑपरेटर को टैक्स की ज़िम्मेदारी तभी देता है जब वे सप्लाई को कंट्रोल करते हैं और पेमेंट लेते हैं। एसएएएस मॉडल में, कोई भी शर्त लागू नहीं होती है। भारत टैक्सी के आने से इस अंतर को नज़रअंदाज़ करना मुश्किल हो गया है। एक कोऑपरेटिव के तौर पर बना यह प्लेटफॉर्म ड्राइवर की ओनरशिप बढ़ाने और प्लेटफॉर्म पर दबदबा कम करने के लिए डिज़ाइन किया गया है। इस मॉडल के तहत राइड के किराए पर जीएसटी लगाना ड्राइवरों के लिए नुकसानदायक होगा।

ड्राइवर यूनियनों ने इस मुद्दे पर आवाज़ उठाना शुरू कर दिया है। तमिलनाडु ऑटो कॉल टैक्सी ड्राइवर्स यूनियन फेडरेशन के प्रेज़ीडेंट ज़हीर हुसैन ने कहा, “हम भारत टैक्सी को सपोर्ट करने की सरकार की पहल का स्वागत करते हैं और वित्त मंत्री के समक्ष अपनी बात रखना चाहते हैं। भारत टैक्सी, नम्मा यात्री और रैपिडो जैसे प्लेटफॉर्म एसएएएस मॉडल पर काम करते हैं, जहाँ ड्राइवर सब्सक्रिप्शन फ़ीस देते हैं और किराए को खुद मैनेज करते हैं। इन प्लेटफॉर्म्स को जीएसटी के तहत भी ऐसा ही ट्रीटमेंट मिलना चाहिए। हर राइड पर जीएसटी लगाने से ड्राइवरों की रोज़ की कमाई सीधे तौर पर कम हो जाएगी, खासकर तब जब ज़्यादातर पहले से ही जीएसटी के दायरे से बाहर हैं।” यह मुद्दा सिर्फ़ थ्योरी नहीं है। एसएएएस प्लेटफॉर्म पर काम करने वाले ज़्यादातर ड्राइवर जीएसटी रजिस्ट्रेशन के लिए तय 20 लाख रुपये की सीमा से काफ़ी कम कमाते हैं, जिनकी सालाना औसत इनकम 2 से 3 लाख रुपये के बीच होती है। उन्हें अपनी सर्विस पर कानूनी तौर पर जीएसटी से छूट मिली हुई है। ऐसे में  प्लेटफॉर्म से न आने वाली राइड इंकम पर टैक्स लगाना असल में उन लोगों पर टैक्स लगाने जैसा है जो असल में टैक्स फ्रेमवर्क से बाहर हैं।

By Business Bureau