एएससीआई की स्टडी के अनुसार कंटेंट और कॉमर्स की एक मिली-जुली दुनिया में जी रही है ‘जेन अल्फा’

छोटे वीडियो अब व्लॉग्स में घुल-मिल गए हैं, जो आगे चलकर गेमप्ले में बदल जाते हैं और फिर ऐसा स्पॉन्सर्ड कंटेंट सामने आता है जो किसी दोस्त की सलाह जैसा लगता है। यहाँ स्क्रीन कभी बंद नहीं होती। जेन अल्फा डिजिटल स्ट्रीम को सिर्फ देखती नहीं, बल्कि उसी के भीतर रहती है। यह वह हकीकत है—जो पूरी तरह से डिजिटल दुनिया में डूबी और कमर्शियल रूप से सक्रिय है—जिसे एडवरटाइजिंग स्टैंडर्ड्स काउंसिल ऑफ इंडिया (एएससीआई) एकेडमी ने समझने की कोशिश की है।

‘फ्यूचरब्राण्ड्स कंसल्टिंग’ के साथ मिलकर एएससीआई एकेडमी ने ‘व्हाट द सिग्मा?’ नाम की एक अनोखी रिसर्च स्टडी जारी की है। यह अध्ययन 7 से 15 साल के बच्चों (जेनरेशन अल्फा) पर केंद्रित है, जिसमें देखा गया है कि वे इस हाइपर-डिजिटल माहौल में मीडिया और कंटेंट से कैसे जुड़ते हैं और कमर्शियल मैसेज को कैसे पहचानते व समझते हैं।

‘एएससीआई एडट्रस्ट समिट 2026’ में पेश की गई यह स्टडी छह भारतीय शहरों में की गई गहन रिसर्च पर आधारित है। इसमें घरों में जाकर इंटरव्यू लिए गए और भाई-बहनों व दोस्तों के बीच की बातचीत को समझा गया। साथ ही माता-पिता, शिक्षकों, काउंसलर्स, मनोवैज्ञानिकों, मार्केटर्स और किड-इन्फ्लुएंसर्स के साथ विस्तार से चर्चा की गई।

यह स्टडी बच्चों के कंटेंट और विज्ञापनों के साथ जुड़ाव के अलग-अलग पहलुओं की पड़ताल करती है। साथ ही यह भी समझती है कि माता-पिता, शिक्षक, विज्ञापनदाता और एल्गोरिदम बच्चों के डिजिटल एक्सपोज़र को किस तरह प्रभावित करते हैं।

एएससीआई की सीईओ और सेक्रेटरी जनरल मनीषा कपूर ने कहा, “एएससीआई एकेडमी की स्टडी ‘व्हाट द सिग्मा?’ जेनरेशन अल्फा की डिजिटल लाइफ की एक जांच है—उन्हें जज करने के लिए नहीं, बल्कि उन्हें बेहतर ढंग से समझने के लिए। उनके कल्चरल रेफरेंस पॉइंट्स पिछली पीढ़ियों से बिल्कुल अलग हैं। विज्ञापन को वे कैसे देखते हैं, यह जानकारी जिम्मेदार जुड़ाव के नए फ्रेमवर्क बनाने की दिशा में पहला कदम है, क्योंकि वे अभी हमारे देश के सबसे कम उम्र के मीडिया कंज्यूमर्स हैं। हमारा मकसद सभी स्टेकहोल्डर्स के बीच एक ऐसी सहयोगी बातचीत शुरू करना है, जो क्रिएटिविटी और जिम्मेदारी के बीच सही संतुलन बनाए रखे।”

By Business Bureau